बुधवार, 18 जून 2014

आँख बचाईए.

आँख बचाईए.

शीर्षक पढकर ही आपको याद आ रहा होगा वह गाना –
अँखियाँ मिलाए कभी अँखियाँ चुराए क्या तूने किया जादू..
मैं ऐसे आँखों के मिलान से बचने की बात नहीं कर रहा हूँ. हाँ मैं इस गाने में कलाकार द्वारा किए गए, आँखों के करतब की बात जरूर कर रहा हूं. यह आँखों को गोल गोल घुमाने की क्रिया आँखों के लिए बहुत ही लाभदायक है.
आज के इस युग में आँखों का काम बहुत बढ़ गया है. सूरज की तीखी रोशनी के साथ साथ अब कृत्रिम रोशनियाँ भी आँख का काम बढ़ा रहीं हैं या यों कहिए कि आँखों को कमजोर करने का काम कर रहीं हैं.
इस दूषित वातावरण में हवा से भी आँखों को नुकसान होता है, सो आँखें धोते रहें.
कोई उड़ती कडी या लहराती हुई वस्तु आँखों को नुकसान न करे, इसका ख्याल रखें. प्रयोगशालाओं में, कार्यशालाओं में केमिकल व धातुओं के कतरनों से बचाव के साधन प्रयोग करे. सेफ्टी गॉगल्स इसके लिए बहुत उपयोगी है. बिजली पर काम करते हुए फ्लेश से हमेशा डरें. यह हाथ और चेहरा तो जला ही देती है, यह आँखों का परमानेंट नुकसान करने की क्षमता भी रखती है.
फेशन करते वक्त चेहरे और आँखों पर लगाने वाले केमिकल से आँखों को बचाए रखें. आँखों पर लगाने वाला लाईनर, कृत्रिम काजल व चेहरे की मेक अप के लिए उपयोगी क्रीम पाउडर भी अपनी थोड़ी कसर पूरी कर लेते हैं.
इस जमाने में आँखों का सबसे बड़ा दुश्मन है कम्प्यूटर. दूसरा है टी वी. चूँकि कम्प्यूटर पर टी.वी. भी देखा जा सकता है, इसलिए यह टीवी से भी ज्यादा नुकसानदायक है. टीवी पर लोग (खासकर स्त्रियाँ) अपनी सीरियल में इतनी मगन हो जाते हैं कि आँखें हटाना तो दूर, पलक झपकने का भी ख्याल नहीं रहता. बड़े बच्चों का पिक्चर के समय यही हाल होता है. छोटे बच्चे कार्टून फिल्म के समय बड़ों को भी टी.वी. के पास फटकने नहीं देते और उनके सभी अवयव टी वी के साथ एकीकृत हो जाते हैं. उनको कार्टून देखने देते हुए उन्हें आप कुछ भी खिलाईए, पिलाईए ... कोई नखरे नहीं होंगे. लेकिन उनके कार्टून फिल्म देखने में दखल दिया तो कुछ भी संभव नहीं होगा. इसके साथ ही हैं वीडियो गेम. जिसमें बच्चे नजर गड़ाए गेम खेलते रहते हैं जो आँखों के लिए अत्यंत हानिकारक है.
अब उससे ज्यादा खतरनाक चीज आ गई है मोबाईल. लोग मोबाईल पर मेल भी पढ़ते हैं, किताबें पढ़ते हैं, पिक्चर और वीड़ियो देखते हैं. छोटे अक्षर देखने के लिए इसे ब्राईट नहीं ब्राईटेस्ट कर लेते हैं और खुद अपने आँखों की तबाही का कारण बनते हैं. याद कीजिए आपको किस उम्र में चश्मा लगा था और आपके बच्चे को किस उम्र में चश्मा लगा है. सामान्य व्यक्ति को 42 की उम्र में चश्मा लगता है, जब नजर कमजोर होनी शुरु होती है. गुजराती में इसे बैताळा कहते हैं जो 42 की उम्र में होती है. आज तो दूसरी-तीसरी के बच्चे को चश्में के साथ देखने पर भी आश्चर्य नहीं होता. किसी-किसी की तो हेरेडिटी होती है. वहां तो मजबूरी है. पर साधारणतः आज के बच्चों के चश्में का कारण मोबाईल, कम्प्यूटर और टी वी है. बड़े बच्चों मे मेबाईल सबसे महत्वपूर्ण कारण बन गया है.
टी वी दोखने या कम्प्यूटर पर काम करने के दौरान आँखों को हर घंटे साफ-स्वच्छ पानी से धोना – एक बहुत अच्छी आदत है. काम करते करते लगभग आधे घंटे में एक बार  दो-चार मिनट के लिए आंखें मूँद लेना चाहिए. इससे आँखों में थकान कम होती है. बीच बीच में पलकों को कुछ-एक बार झपकते रहना चाहिए.
घर से बाहर कतार में सबसे आगे खड़े हुए हैं, ऑटोमोबाईल के हेड- लाईट. ड्राईवरों को जो तकलीफ होती है सो सही, उनकी आँखों को तो नुकसान होता ही है, पर राहगीरों को भी अंधापन जल्दी देने में कोई कसर नहीं छोड़ता. शहर के अंदर जहाँ स्ट्रीट लाईट लगी है, वहां भी ये ड्राईवर हेड लाईट को लो भी नहीं कर सकते. शायद हाई हेडलाईट ही उनकी शान है. चौराहे की पुलिस की ड्यूटी तो दिन-दिन में रहती है और रोशनी होने के पहले ही वह घर पहुँच जाता है.
इन सब से हटकर है, बढ़ता निर्माण कार्य – जिसमें बिना किसी सावधानी के खुले में वेल्डिंग की जाती है. कानून नाम की कोई चीज है – ऐसा प्रतीत तो नहीं होता.
वेल्डिंग की वजह से आँखों को जो नुकसान होता है, उसकी कीमत तो कोई वेल्डर ही जाने. गलती से भी अगर आपकी नजर वेल्डिंग की ज्वाला पर पड़ी तो आँखें तो एक बार को चौंधिया जाती हैं. यदि कुछ सेकंड देख लिया, तो रात को नींद नहीं आती और आंखों मे जलन सा होने लगता है. वैसे डॉक्टर कई तरह के ड्रॉप्स डालने को कहते हैं पर सबसे सस्ता, सुंदर, टिकाऊ और लाजवाब घरेलु नुस्खा है – गुलाब जल. आँखों की परेशानी होने का भान या ज्ञान होने के तुरंत बाद से आंखों में दो बूंद गुलाब जल डालकर आँखें मूंद कर आराम करें. जब आंखों से पानी निकलना रुक जाए, तब आँखों को साफ–ठंडे पानी से धो लें, तो अपना (आँखों के लिए) हल्का काम कर सकते हैं. अच्छा होगा कि कोई काम करने के पहले एक बार, फिर रात को खाने का बाद और सोने के पहले एक और बार दो बूँद गुलाब जल आँखों में डाल लें. आँखों में आराम भी होगा और नींद भी आएगी. सुबह तक आँखें नार्मल हो जाएंगी. अक्सर वेल्डर  रोज आँखों में गुलाब जल डालते हैं. या फिर डॉक्टर के सुझाए ड्राप्स साथ लेकर चलते हैं.
वेल्डिंग इन्स्पेक्टर को हमेशा वेल्डिंग गॉगल्स पहन कर ही फील्ड में जाना चाहिए. जिस तरह बाहर सूरज पर, कमरे में सीएफ एल या ट्यूब पर जरूरत न होने पर भी नजर जाती है, उसी तरह पास पड़ोस में हो रहे वेल्डिंग के चकाचौंध के कारण वेल्डिंग आर्क पर भी नजर जाती है. अक्सर कहा जाता है कि वेल्डिंग इन्स्पेक्टर को वेल्डिंग आर्क देखने की क्या जरूरत है, उसे तो वेल्डिंग के बाद निरीक्षण करना है. लेकिन निरीक्षण करते वक्त पास यदि वेल्डिंग हो रही है, तो उसकी नजर वेल्डिंग पर जाएगी ही.. यह मानव स्वभाव है. इसे नकारा नहीं जा सकता.
आप उम्मीद करते हो कि पास से गुजर रहे दोस्त आपको देखें. यदि वह पास से निकल जाता है तो पूछते भी हो – यार बगल से निकल गया देखा तक नहीं. किंतु उम्मीद करते हो कि पास के चकाचौंध सी वेल्डिंग पर नजर न जाए.. कितना उचित है ???
घरेलू नुस्खों में गुलाब जल को सबसे उत्तम माना जाता है. आँखों की थकान कम करने के लिए दोपहर या रात में सोते समय बंद आँखों पर चकती की रूप में कटी खीरे को रखने से थकान कम होती है.
दिन में सुबह कम से कम एक बार और यदि हो सके तो रात में सोने से पहले एक और बार आँखों की कसरत कर लेनी चाहिए. इसके लिए आप अँखियाँ मिलाए कभी अँखियाँ चुराए क्या तूने किया जादू..वाले गाने का वीडियो देखें. जिस तरह से आँखों की पुतलियों को घुमाया गया है, यह आँखों के लिए एक बेहतरीन कसरत है.  जिसमें सर सीधा सामने की ओर रखते हुए आँखों की पुतलियों को घुमाकर चेहरे के चारों ओर जितना हो सके देखने की कोशिश करनी चाहिए. पर ध्यान रहे कि पुतलियाँ एक जगह ठहरी नहीं रहें – चलती रहे. पंद्रह सेकंड से आधा मिनट का समय काफी होता है, इस व्यायाम के लिए. यदि पुतलियों के घूमने की दिशा का परिवर्तन कर सकें तो और भी अच्छा है.
शादी –बारातों की और दिवाली की आतिश बाजियाँ विद्युत ( बिजली) और रसायन का मिश्रण होती हैं. इनके कण यदि आँखों में चुभ जाएं तो खतरनाक हानि हो सकती है. सँभलने से बड़ा कोई उपाय नहीं है. हाँ मुसीबत आने पर डॉक्टर के पास तो जाना ही पड़ेगा.
सूर्य, मेटल होलाईड या सी एफ एल लाईट को एकटक न देखें संभवतः कवर लगे हुए इंडैरेक्ट सी एफ एल का ही इस्तेमाल करें. साधारण बल्ब, ट्यूबलाईट के मुकाबले सी एफ एल की इंटेन्सिटी बहुत ज्यादा होती है. यह आँखों के लिए ज्यादा नुकसान दायक है, पर बिजली बचाती है. निर्णय आपका है कि आँख बचाएँगे या पैसा.
बच्चे खेल खेल में ( डॉक्टरों का नकल करते हुए) आँखों में टार्च की रोशनी डालते हैं. आजकल बीम टार्च बाजार में है और उनकी तेज तीखी रोशनी आँखों के लिए हानिकारक है. यदि कोई मजबूरी न हो तो तेज लेजर बीम की रोशनी आँखों में न पड़ने दें.
बैटरी बैंकों पर काम करने वालों को अपनी आँखों में एसिड पड़ने से बचने हेतु विशेष ध्यान देना चाहिए. किन्ही तकनीकी कारणों से बैटरी फट जाए, तो ऐसा खतरा होता हैं.  फिर बैटरी में एसिड भरते समय जार हाथ से छूटने पर एसिड छलक सकता है. ऐसे हादसे भी देखे गए हैं जिसमें बैटरी के रखरखाव के दौरान वोल्टेज नापने के लिए कारीगर ने मल्टीमीटर को एम्पियर सेलेक्शन में रख रखा था. कनेक्ट करते ही मीटर के तार जलने लगे और बैटरी फूट गई. बैटरी तो गई ही, पर कारीगर के चेहरे पर तेजाब व फूटे बैटरी के टुकड़ों से चोटें आईँ. तुरंत किए गए प्राथमिक उपचार व डॉक्टरी सहायता के कारण नुकसान बहुत ही कम हुआ, पर हो ही गया. ऐसी गलतियों से परहेज करने का विशेष द्यान रखना आवश्यक है. परवरदिगार का शुक्र है, आँखें बच गईं.
बैटरी बैंक के कमरे में एक्जॉस्ट फेन चलते रहना जरूरी है अन्यथा एसिड के फ्यूम इकट्ठा होते हैं जो आँखों व दिल के लिए खतरनाक होते हैं. कमरे में या पास में पानी का इंतजाम होना चाहिए. एसिड पडने पर बोरिक एसिड पाउडर से आँखों को धोया जाता है. इसलिए वहाँ बोरिक एसिड पाउडर भी रखना आवश्यक है.
दैनंदिन कार्यों के दौरामन सड़क पर की उड़ती धूल, आँधी की धूल, कार्यशाला में बिखरे धातु के कतरन के आँखों मे आने, मेटल हेलाईड व सीएफ एल व लैंप लेजर बीम को सीधे देखना, वेल्डिंग की रोशनी को निहारना – इन सब से बचना चाहिए. जहाँ भी जरूरी हो प्रोटेक्टिव ( ऱक्षक) उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए.
रामायण व महाभारत सीरियल के समय बच्चों मे तीर कमान का खेल काफी प्रसिद्ध हुआ और फलस्वरूप तीरों के लगने से बहुत से बच्चों की आँखों में तकलीफ हुई. कुछ की तो नजर गई ही होगी.
छोटे बच्चे खेल के शौक से रंगीन चश्मों की मांग करते हैं. कोई गॉगल्स चाहता है. ऐशे में बच्चे को खरीदकर दे देना चाहिए. आप ख्याल रखें कि खेल खेल में ही बच्चा जाने अन्जाने अपनी आँखओँ की रक्षा भी कर सकेगा.
कहा जाता है कि मछली के सेवन से नजर तेज होती है पर बंगाल में इतनी मछली खाई जाने के बाद भी बहुत से बंगालियों को कम उम्र में ही चश्मा लग जाता है.
सावधानी के तौर पर, साल में कम से कम एक बार डॉक्टर से आँखों की जाँच करवा लेनी चाहिए. खास कर उन लोगों को जिनको चश्मे की जरूरत होती है. आँखों की आवश्कतानुसार चश्मे का प्रयोग न होने से दृष्टि तो बिगड़ ही जाती है साथ ही आँखें और खराब होने का डर भी रहता है.
माड़भूषि रंगराज अयंगर

गुलाब जल. वेल्डिंग, मोबाईल, टी.वी. कम्प्यूटर