शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

प्रासंगिक चुनावी मुद्दे

प्रासंगिक चुनावी मुद्दे
प्रत्येक राजनीतिक चुनाव में – चाहे वह किसी भी किस्म का हो, पैसे तो जमकर खर्चे जाते हैं. मैं इसे निवेश कहना नहीं चाहूँगा. खर्चा कोई भी करे. अंततः यह सरकार पर ही तो बोझ है. सरकार को पैसा आता कहाँ से है... आम जनता से ही ना... किसी को इसकी चिंता है ?

ये जो एन जी ओ हैं, जो अपने आप को सतर्कता अधिकारी से कम तो नही समझते, क्या कर रहे हैं ? इतने सारे एन जी ओ में कितने सही मायने में सतर्क हैं ? क्या इन्हें सवाल नहीं करना चाहिए था ? अब सवाल है कि - सवाल किसलिए करना चाहिए था? सुनिए जवाब कि –

 अ.) सवाल इसलिए करना चाहिए था

  1. जब पार्टी बनाकर चुनाव लड़े जाते हैं, तब चुनावों के बाद, जनमत की अवहेलना कर, अपनी निजी उद्धार के लिए जो चुने गए प्रतिनिधि अपना दल बदलते हैं, उनके बारे में तो खुले आम कहा जा सकता है कि वे किसी भी पार्टी के मत या मंतव्य को नहीं मानते. उन्हें केवल अपनी भलाई नजर आती है. ऐसे दलबदलुओं का चयन निरस्त क्यों नहीं कर देना चाहिए? उनकी करतूतों की वजह से हुए चुनावी नुकसान की भरपाई उनसे क्यों न कराई  जाए ?  और तो और  उनके चुनाव के रद्द होने से जो चुनाव कराया जाना है, उसका खर्चा उनके सिर क्यों न मढ़ा जाए ?

  1. कुछ छोटी स्थानीय, क्षेत्रीय या राज्यीय पार्टियाँ किसी एक राष्ट्रीय पार्टी को समर्थन देकर या उससे समर्थन लेकर चुनाव लड़ती हैं और चुनाव के बाद सबसे ज्यादा सीट मिलने वाली या किसी अन्य पार्टी के साथ जुड़ जाती हैं. वैसे इसका विपरीत भी संभव है कि मंत्रिमंडल में जगह न मिलने के कारण भी पार्टियाँ समर्थन वापस ले लेती है. ऐसी हालातों में उस पार्टी के बारे में साफ तौर पर कहा जा सकता है कि उसे किसी पार्टी विशेष से कुछ लेना देना नहीं है. उसे तो अपना उल्लू सीधा करना है. जो मकसद पूरा करेगा उसे ही समर्थन दिया जाएगा. क्यों न ऐसी हालातों में उस छोटी पार्टी के चुने गए प्रतिनिधियों का चुनाव निरस्त कर दिया जाए ? तथा उस पार्टी के उम्मीदवारों के चुनाव में हुए और पुनर्निर्वाचन में होने वाले खर्चे का भुगतान करने को मजबूर किया जाए ? बात आगे बढ़ने पर पार्टी की मान्यता रद्ध करने की भी सोची जा सकती है.

  1. ऐसे उम्मीदवार भी हैं जो एक से ज्यादा जगहों पर चुनाव लड़ते हैं – मकसद कुछ भी हो – यदि कोई उम्मीदवार ऐसा करता है, तो दोनों जगह जीतने पर एक सीट खाली करनी पड़ती है. कोई भी उम्मीदवार हारने के लिए चुनाव लड़ता है ऐसा माना नहीं जा सकता, चाहे उसके जीतने की उम्मीदें कितनी भी कम हों. इसी मकसद से सुझाया जाता है कि ऐसे उम्मीदवारों से उनके नामांकन दाखिलों की संख्या से एक कम सीट पर मतदान और पुनर्मतदान का खर्चा, उनसे नामांकन के समय ही वसूला जाए. इसके लिए जरूरी हो जाएगा कि चुनावी नामांकन पत्र में इसका जिक्र हो कि वह कितने स्थानों से चुनाव नामांकन पर्चा दाखिल कर चुका हैं. चुनाव के बाद वसूलना को किसी के बस की बात नहीं होगी.
  2. कुछ निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनाव लड़ते हैं. यदि चुनाव के पहले उनने किसी का समर्थन लिया है या किसी को समर्थन दिया है तो उनके साथ भी  समर्थन बदलने पर मुआवजा वसूलने की कार्रवाई की जानी चाहिए. जो बिना किसी समर्थन के चुनाव जीतते हैं उन्हें तो किसी भी दल को समर्थन देने का हक होना चाहिए, क्योंकि उनने केवल अपने बूते पर ही चुनाव जीता है. हाँ यदि वे पार्टी जॉइन कर लेते हैं तो उनके साथ भी दलबदलने का कारण मुआवजा वसूलने की कार्रवाई की जानी चाहिए.

दलबदलुओं पर मेरी राय है कि वे जिस पार्टी से या के समर्थन से जीतते हैं उसमें जनता उनकी पार्टी की साख को भी सोचकर मत देती है. ऐसे में दल बदलना जनता के साथ धोखा हुआ और जनमत का निरादर – जिसको मान्य नहीं किया जा सकता.

ब.) अब आते हैं चुनावी घोषणा पत्र पर ----

  1. प्रत्येक पार्टी अपने दल का चुनावी घोषणा पत्र जाहिर करती है. लेकिन उसमें दिए गए सारे मुद्दों पर सही और समान जोर नहीं होता. कुछ पर वे खासे पक्के होते हैं, कुछ को वे करना चाहते हैं  और पूरी उम्मीद करते हैं कि कर पाएंगे, और कुछ शायद ना कर पाए. कुछ कर पाते है कुछ कर नही पाते. कुछ ऐसे मुद्दे भी होते हैं, जिनको घोषणा पत्र में रखना, किसी अन्य कारण से जरूरी होता है. पर निश्चित है कि उनका कार्यान्वयन नहीं होना है. यह तो केवल पार्टी विशेष को पता रहता है. लेकिन इसी के कारण जनता दुविधा में रहती है और पार्टी की साख के हिसाब से या तो सबको मान लेती है या सबको नकार देती है - जो सही नहीं है. पार्टियों को चाहिए कि वे अपने घोषणापत्र पर खरे उतरें और कार्यान्वय़न नहीं हो पाने की स्थिति में जनता के प्रति उत्तरदायी रहे.

  1. मुझे बहुत खुशी हुई कि भाजपा और काँग्रेस दोनों ने केजरीवाल की आप सरकार को दिल्ली में इसीलिए घेरा था कि उनने घोषणा पत्र के अनुरूप कार्य नहीं किया. मैं चाहता हूँ कि ऐसा ही सबके साथ हो और केजरीवाल की तरह सभी पार्टियाँ जवाब देने के लिए उत्तरदायी हों. समय समय पर पीठासीन व विपक्षी पार्टियों में इस बात की भी बहस होती रहनी चाहिए कि कौन सी घोषणा छूट रही है. इससे प्रतिनिधि, निधिपति न बनकर अपना काम सजगता से कर सकेंगे.

  1. हाल ही में मुख्य निर्वाचन आयोग ने एक सम्मेलन किया था जिसके तहत विभिन्न पार्टियों के प्रतिनिधियों से – घोषणा पत्र मे दिए गए मुद्दों पर कितनी जवाबदेहीपर चर्चा की थी. यदि दूरदर्शन की मानूं तो बसपा के अलावा किसी ने स्वीकार नहीं किया कि पार्टियों की कोई जवाबदारी होनी चाहिए. पर ऐसा क्यों? यदि घोषणा पत्र मे दिए मुद्दों पर जवाबदेही नहीं तो घोषणापत्र का क्या अर्थ है ..एक पत्थरों का हार ? केवल निरक्षरों और आम जनता जो इस तरफ सचेत नहीं हैं, को बहकाने का ढकोसला. वैसे साक्षर भी कितना पढ़ते हैं पार्टियों का घोषणा पत्र. उन्हें पढ़ना चाहिए. इस पर शायद निर्वाचन आयोग भी कार्रवाई कर सकता है. यदि नहीं तो समाज के प्रतिष्ठित जन इस पर जोर लगाएँ.

  1. सरकारी दफ्तरों में, सराकरी अनुदान प्राप्त संस्थाओं में, अर्धसरकारी अनुष्ठानों में, और सार्वजनिक उद्योगों में पद,  अधिकारी नहीं सेवक होना चाहिए. इन्हे अंग्रेजी में तो पब्लिक सर्वेंट कहते हैं, पर बन जाते ऑफिसर हैं. इस विडंबना को दूर करना बहुत जरूरी हो गया है. अन्यथा अधिकारियों की मानसिकता प्रभावित होती है और जनता को वे सेवक से ज्यादा कुछ समझ ही नहीं पाते.

  1. नेता अपनी उम्मीदवारी के समय सेवक बनकर आपसे मतदान की याचना करते हैं और चुने जाते ही, आप उनके सामने गिड़गिड़ाने लगते हैं. क्योकि प्रतिनिधि बनने आए उम्मीदवार को निधिपति होने का आभास हो जाता है. इस बात को खास तौर पर सोचना विचारना पड़ेगा. जरूरत के अनुसार इसे विभिन्न स्तरों पर चर्चा का विषय बनाना होगा और निर्णय लेना होगा कि जनता इन प्रतिनिधियों को निधिपति का रूप धारण न करने दे.  इसके लिए उपरोक्त में से कोई नहीं (None of the above - NOTA ) और वापस बुलाने का अधिकार (authority to call back) भी जनता को मिलना चाहिए. जिसके लिए बुद्धजीवियों को आगे आना होगा.
स.) अब कुछ अन्य मसलों पर आएँ –

चुनाव में हर पार्टी अपने अपने ध्येय, घोषणापत्र और अंतर्मन लिए आते हैं. छोटी पार्टियां कभी कभी बड़ी पार्टियों को समर्थन देती है तो कभी समर्थन लेती है. निर्दलीय कभी पहले से जुड़ जाते हैं तो कभी चुनाव के बाद. फिर कभी कभी गठबंधन भी  अंततः होता है. एक पार्टी या गठबंधन पीठसीन होता है और दूसरी विपक्षी पार्टी. निर्दलीय अलग थलग बच जाते हैं जो मुद्दों पर अपना समर्थन या विरोध प्रदर्शित करते हैं.

मेरी राय है कि गठबंधन के समय सारी पार्टियाँ (यह प्रमुख पार्टी की जिम्मेदारी होनी चाहिए) मिल बैठ कर अपने अपने घोषणा पत्र की चर्चा कर लें और फिर गठबंधन का एक घोषणा पत्र तैयार करें, जिसमें मुद्दों को उनकी प्राथमिकता की श्रेणी में रखा जाए. तत्पश्चात संसद         (सम्मिलित लोकसभा एवं राज्यसभा) में या फिर विधानसभा एवं विधान परिषद में, जैसी स्थिति हो उसकी पुनर्चर्चा होनी चाहिए जिससे हमारी संसद या सभाओं की प्राथमिकताएं आम जनता तक पहुँचे. इससे ज्यादा सम्मत मुद्दों पर कार्रवाई हो सकेगी.

इस कार्यविधि के बाद प्रत्यक्ष रूप से पीठासीन पार्टी यानि सरकार और  अप्रत्यक्ष रूप से सारी संसद जनता के प्रति जवाबदेह होगी, कि मुद्दों का कार्यान्वयन क्यों नहीं हो सका. ऐसी सूरत में ही प्रतिनिधियों को अपनी जिम्मेदारी का एहसास होगा और देश की प्रगति में प्रतिनिधि नहीं सारी जनता भागीदार होगी. दिशा निर्देशन में भी जनता की भागीदारी होगी. हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी का एहसास हुआ करेगा. कोई प्रतिनिधि निधि पति बनने की सोच नहीं पाएगा.
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एम.आर. अयंगर.